देखु सखी, इनकी नव नेह - श्री अलबेली अलि

देखु सखी, इनकी नव नेह - श्री अलबेली अलि

(राग सोरठ)
देखु सखी, इनकी नव नेह। 
उमड़िह ढेर घन रूप के मानों, बरसत रस कौ मेह ।। [1]
खान-पान बसनन कल भूषन, भूले सब सुधि देह ।
'अलेबली' नहिं जानति निसिदिन, परे प्रेम के गेह ।। [2]
- श्री अलबेली अलि 

हे सखी, श्री राधा कृष्ण की नव नेह को निहार, ऐसा लगता है मानो घने बादल उमड़ उमड़ कर रस की वर्षा बरसा रहे हैं । [1]

नित्य विहार में प्रिया प्रियतम खान, पान, वस्त्र, आभूषण इत्यादि सब कुछ भूल चुके हैं, और तो क्या कहें अपनी देह की पूर्ण सुधि को भी भूला चुके हैं । श्री अलबेली सखी कहती हैं कि प्रिया प्रियतम यह भी नहीं जान रहे कि दिन हुआ है या रात, यह दोनों प्रेम के आँगन में नित्य ही विलस रहे हैं । [2]