नर संसारी लगन में, दुख सुख सहैं करोर।
नारायण हरि प्रीति में, जो होवै सो थोर॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (135)
संसारी जीव संसार की लगन में ही करोड़ों प्रकार के सुख-दुःख सहते रहते हैं, फिर भी उससे लगे रहते हैं; परन्तु यदि हरि-प्रेम ही लक्ष्य हो, तो उसके समक्ष जो भी सुख-दुःख भोगना पड़े, वह सब तुच्छ है।
नारायण हरि प्रीति में, जो होवै सो थोर॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (135)
संसारी जीव संसार की लगन में ही करोड़ों प्रकार के सुख-दुःख सहते रहते हैं, फिर भी उससे लगे रहते हैं; परन्तु यदि हरि-प्रेम ही लक्ष्य हो, तो उसके समक्ष जो भी सुख-दुःख भोगना पड़े, वह सब तुच्छ है।

