(राग सारंग)
बैठे लाल निकुंज भवन ।
रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन ।। [1]
तूँ सखी काम केलि मन मोहन मदन दवन ।
वृथा गहरु कत करति कृसोदरी कारन कवन ।। [2]
चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन ।
(जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (40)
श्री हित सखी ने फिर कहा- “ हे मानिनि [श्री राधे] ! लाल ( तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए ) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं । ( इस समय ) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात्रि है , मल्लिकाएँ खिल रही हैं और शीतल , सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है । [1]
( ऐसे अवसर में ) हे सखी ! केवल एक तू ही है जो अपनी काम केलि के द्वारा मन मोहन के मदन ( ताप ) का दमन ( शमन ) कर सकती है , तब हे कृशोदरि ! व्यर्थ विलम्ब क्यों कर रही हो ? कारण क्या है ? [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि अपने कानों यह सुनते ही श्रीप्रियाजी को तन सुधि का भी विस्मरण हो गया ( -वे श्रीलालजी के विरह दुःख से अत्यन्त विह्वल होकर ) शीघ्रता पूर्वक चल पड़ीं तब रस लम्पट रमण श्रीलालजी श्रीराधिका से मिले । [3]

