ललिते सखि वरे श्रष्ठे यदुक्त पूर्वमेव हि । कथं मर्त्याः विमुच्यन्ते संसारसर्प दंष्ट्रकात् ॥
तदर्थं निर्मिता केलिरनघाप्तिस्तु मत्पदे । यो मर्त्यश्चिन्तयेन्नित्यं केलिनिर्गमनं मम ॥
स सम्प्राप्स्यति मद्धाम वितर्को नात्र कश्चन ।
- सनत्कुमार संहिता (32.145)
श्रीराधा कहती हैं कि हे ललिते ! तेरे पूछने पर मैंने यही तो कहा था, जो हमारी ऐसी निर्गमन केलि का चिन्तन करेगा, वही वृन्दावन को प्राप्त कर सकेगा। इसमें कोई तर्क-वितर्क करने का अवकाश नहीं।

