मोहि दीजै जू ब्रजवास -  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (755)

मोहि दीजै जू ब्रजवास - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (755)

मोहि दीजै जू ब्रजवास ।
सुनौ नंद बृषभानराय जू पुजवौ जिय की आस ।। [1]
नीके रहौ राधिका-मोहन दिन दिन अधिक हुलास ।
आनँदघन छाउँ गुन गाउँ दुहुँ घर के चहुँ पास ।। [2]
-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (755)

श्री आनंदघन कह रहे है "हे नन्द महाराज तथा वृषभानु राय जी, कृपया मुझे ब्रजवास प्रदान कीजिये, मेरे ह्रदय की इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिये। [1]

श्री राधिका मोहन ऐसे ही सुख पूर्वक रहें, जिससे दिन प्रतिदिन ह्रदय में हुलास बढ़ै। श्री आनंदघन कह रहे है "मैं नन्द महाराज तथा वृषभानु राय जी [अर्थात ब्रज में], दोनों के महलों के चारों तरफ घूम घूम कर श्री राधिका मोहन के गुणों का गान करूँगा।" [2]