मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि छाड़िं प्रिय कौन पै जाऊँ ।
कृष्णदास कहै या त्रिभुवन में तेरे द्वारे बिना हरि नाहीं कहूँ ठाऊँ ।।

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

हे मेरे प्राण प्यारे श्री गिरिधर लाल, तुम्हें छोड़ कर मैं अब किसके पास जाऊँ [आपकी शरण ग्रहण कर अब यह असम्भव है] । अब त्रिभुवन में तुम्हारे द्वार के बिना मेरा कोई और द्वार नहीं  है !