बृज ही मे मोरन के पच्छन कौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (101)

बृज ही मे मोरन के पच्छन कौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (101)

(कवित्त)
बृज ही मे मोरन के पच्छन कौ मुकुट धार्यो,
बृज ही में रस केलि करन हुलासते।[1]
बृज ही में जूरा दै बनायौ नटवर वेष, 
बृज ही के लोगन कूँ बाँधे प्रेम पासते ॥ [2]
बृज ही के फूलनि सिंगारे रहत द्यौस निसि, 
बृज ही के नागर कहावै गुन रासते। [3]
बृज संबंधी रूप लीला सब जग गाई, 
पाई परमेसुर हू शोभा बृज बासते ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (101)

इस ब्रज भूमि की ही महिमा है कि श्रीकृष्ण ने मोर के पंखों का मुकुट धारण किया है। केवल ब्रज ही में वह केली रस को करने के लिए हर्षोल्लास से परिपूर्ण रहते हैं। [1]

केवल यहीं ब्रज में वह नटवर रूप धारण करके नृत्य करते हैं। ब्रज में ही श्रीकृष्ण समस्त मर्यादाओं को तोड़ ब्रज वासियों के संग प्रेम के बंधन में बँधते हैं। [2]

केवल ब्रज के फूलों से ही वह दिन-रात स्वयं को सजाते हैं। ब्रज के ही इन नागर शिरोमणि श्री कृष्ण को समस्त गुणों की राशि माना जाता है। [3]

पूरा विश्व श्री कृष्ण की ब्रज सम्बंधित मधुर लीलाओं का ही गुणगान करता है क्योंकि इस ब्रज से सम्बंधित होने के कारण ही परमेश्वर श्री कृष्ण की पूर्णतम शोभा है। [4]