अहो पिय! जब तुम्हरी बनि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (4)

अहो पिय! जब तुम्हरी बनि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (4)

अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं।
तव मुखचंद्र चकोर पियत नित, दृगन न नेकु अघैहौं।। [1]
ह्वै तुम्हरी अपनों करि तुमको, तन मन प्राण लुटैहौं ।
तव कर परस पाय मदमाती, फूली अँग न समैहौं ।। [2]
नचिहौ बनि उनमादिनि छिन छिन, तुम्हरोइ गुनगन गैहौं ।
मन भाई 'कृपालु' करि भुज भरि, पुनि पुनि कंठ लगैहौं ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (4)

हे प्रियतम श्यामसुन्दर! मैं जब तुम्हारी बन जाऊंगी तब तुम्हारे मुखचन्द्र की रूप माधुरी को निरन्तर पीते हुए भी मेरे नेत्र रूपी चकोर थोड़ा भी तृप्त न होंगे वरन् बार-बार दर्शनों की अभिलाषा बढ़ती ही जायेगी। [1]

तुम्हारी बनकर एवं तुमको अपना बनाकर, तुम्हारे ही ऊपर आनन्द विभोर होकर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व लुटा दूँगी। तुम्हारे कोमल कर कमलों के मधुर स्पर्श को पाकर मतवाली हो जाऊँगी । [2] 

उन्मत्त होकर तुम्हारे गुणगान गाती हुई क्षण-क्षण में बार-बार नाचा करुँगी। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि फिर मैं भली-भाँति अपनी मनभाई करूँगी एवं सर्वांग आलिंगन पूर्वक बार-बार तुम्हें अपने गले लगाउँगी। [3]