दुःख दिखावत लाडिली, कर मूंदित निज गात।
अति अधीर हा हा करै, लाल खिलौना हात॥
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (13)
श्री किशोरी जी अपने को हस्त-पल्लवों से ढक लेती हैं। जब लालजी अत्यन्त अधीर होकर उनके सामने ‘हा-हा’ करते हुए मानो उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं—जैसे वे नचाती हैं, वैसे ही नाचने को उद्यत हो जाते हैं—तब कहीं जाकर बड़ी कठिनाई से वे उन्हें अपनी रूप-माधुरी के दर्शन कराती हैं।

