(राग विहाग)
यह तुमसों माँगों गिरिराई ।
जन्म ही जन्म तरहटी बसिवो व्रजरज तजि चित अनत न जाई।।[1]
हरिसेवा रसपान करौं और श्रीभागवत रसना मुखगाई ।।
रसिक दास यह जन की प्रतिज्ञा श्री वल्लभ कुल नित्य सिरनाई।।[2]
- श्री हरिराय जी
हे गिरिराज महाराज, आपसे यही वर माँगता हूँ कि जन्म जन्म आपके समीप ब्रज में ही निवास करूँ, एवं ब्रज की रज को छोड़ कर कहीं भी न जाऊँ । [1]
यह तुमसों माँगों गिरिराई ।
जन्म ही जन्म तरहटी बसिवो व्रजरज तजि चित अनत न जाई।।[1]
हरिसेवा रसपान करौं और श्रीभागवत रसना मुखगाई ।।
रसिक दास यह जन की प्रतिज्ञा श्री वल्लभ कुल नित्य सिरनाई।।[2]
- श्री हरिराय जी
हे गिरिराज महाराज, आपसे यही वर माँगता हूँ कि जन्म जन्म आपके समीप ब्रज में ही निवास करूँ, एवं ब्रज की रज को छोड़ कर कहीं भी न जाऊँ । [1]
मैं नित्य ही निष्काम हरि सेवा के सुख [रस] का पान करता रहूँ एवं मुख से भगवान का गान करता रहूँ । श्री हरिराय जी कहते हैं कि अपने इस जन की यह प्रतिज्ञा को आप ही निभाना जिससे मैं श्री वल्लभाचार्य एवं श्री वल्लभ कुल के आदर्शों पर चलता रहूँ एवं नित्य ही शीश झुकाता रहूं । [2]

