वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ।
भाग भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (103)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन-यशरूपी सौ रत्नों की माला गूंथकर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य-संयोग लिखा होगा, वही इसे धारण करेगा।
भाग भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (103)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन-यशरूपी सौ रत्नों की माला गूंथकर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य-संयोग लिखा होगा, वही इसे धारण करेगा।

