(राग बिलावल वा तोड़ी)
निर्तत राधा नन्द किशोर ।
ताल मृदंग सहचरी बजावत, बिच-बिच मोहन मुरली कल घोर ।।[1]
उरप तिरप पग धरत धरणि पर, मंडल फिरत भुजन भुज जोर ।। [2]
शोभा अमित बिलोक 'गदाधर', रीझ, रीझ डारत तृण तोर ।।[3]
- श्री गदाधर भट्ट
श्री राधा कृष्ण नृत्य कर रहे हैं। सहचरियाँ ताल मृदंग इत्यादि बजा रही हैं और बीच बीच में मोहन श्री कृष्ण मुरली की तान उस ताल से मिला कर बजा रहे हैं। [1]
वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतियाँ मन्द मंद ले रहे हैं एवं रास रस में विभोर होकर श्री राधा कृष्ण एवं सखियां नृत्य कर रही हैं । [2]
श्री गदाधर जी इस अद्भुत शोभा को निहार कर रीझ रीझ कर बलिहारी जा रहे हैं। [3]
निर्तत राधा नन्द किशोर ।
ताल मृदंग सहचरी बजावत, बिच-बिच मोहन मुरली कल घोर ।।[1]
उरप तिरप पग धरत धरणि पर, मंडल फिरत भुजन भुज जोर ।। [2]
शोभा अमित बिलोक 'गदाधर', रीझ, रीझ डारत तृण तोर ।।[3]
- श्री गदाधर भट्ट
श्री राधा कृष्ण नृत्य कर रहे हैं। सहचरियाँ ताल मृदंग इत्यादि बजा रही हैं और बीच बीच में मोहन श्री कृष्ण मुरली की तान उस ताल से मिला कर बजा रहे हैं। [1]
वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतियाँ मन्द मंद ले रहे हैं एवं रास रस में विभोर होकर श्री राधा कृष्ण एवं सखियां नृत्य कर रही हैं । [2]
श्री गदाधर जी इस अद्भुत शोभा को निहार कर रीझ रीझ कर बलिहारी जा रहे हैं। [3]

