मन अटकौ रै जात है - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (62)

मन अटकौ रै जात है - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (62)

मन अटकौ रै जात है, एक एक ही ठौर।
श्रीवृंदावन वैभव कहौ, कैसे वरनौ और॥

- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (62)

मेरा मन मोहित होकर वृन्दावन के एक-एक ठौर पर अटक जाता है। ऐसी अद्भुत श्री वृन्दावन की भूमि के दिव्य वैभव का मैं किस प्रकार वर्णन करूँ?