आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित्
कालो मयातिगमितः किल साम्प्रतं हि ।
त्वञ्चेत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे
प्राणैर्ब्रजेन च वरोरु वकारिणापि ।।
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (102)
हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप मुझ पर मुझ कृपा नहीं करती हैं, तो फिर जीवित रहने का, व्रज में वास करने का यहां तक कि श्रीकृष्ण से ही मेरा क्या प्रयोजन है ?
कालो मयातिगमितः किल साम्प्रतं हि ।
त्वञ्चेत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे
प्राणैर्ब्रजेन च वरोरु वकारिणापि ।।
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (102)
हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप मुझ पर मुझ कृपा नहीं करती हैं, तो फिर जीवित रहने का, व्रज में वास करने का यहां तक कि श्रीकृष्ण से ही मेरा क्या प्रयोजन है ?

