(दोहा)
जमुना बंसीबट निकट, हरन हिंडोरै हीय ।
रंगदेव्यादि झुलावहीं, झूलत प्यारी पीय ॥
(पद) [इकताल, राग - मल्हार]
हिंडोरैं झूलत हैं पिय प्यारी ।
श्री रंगदेवि सुदेवि बिसाषा, झोटा देत ललितारी ।। [1]
श्री जमुना बंसीवट के तट, सुभग भूमि हरियारी ।
तैसेइ दादुर मोर करत धुनि, सुनि मन हरत महारी ।। [2]
घन गरजनि दामिनि तें डरि पिय, हिय लपटी सुकुँवारी ।
जै श्रीभट्ट निरषि दंपति छबि, देत अपनपौ बारी ।। [3]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (93)
(दोहा)
बंशीवट के समीप कालिन्दी (यमुना) के पावन तट पर श्रीप्रिया-प्रियतम दिव्य हिंडोले में झूल रहे हैं। श्रीरंगदेवी आदि सखियाँ सप्रेम उन्हें झूला झुला रही हैं।
इस सुखद छवि का दर्शन कर श्रीभट्टजी कहते हैं—
इस सुखद छवि का दर्शन कर श्रीभट्टजी कहते हैं—
(पद)
वंशीवट के निकट श्री यमुना तटवर्ती सुंदर हरी भरी भूमि में श्री प्रियाप्रियतम हिंडोला झूलते हैं। श्री रंगदेवी, सुदेवी, ललिता, विशाखा आदि सखियों मंद-मंद झोकों से उन्हें झुलाती हैं। [1]
मेघ गर्जन के साथ मन का हरण करने वाली दादुरों और मयूरों की ध्वनि इस हरित वृंदावन की भूमि में अति मनभावन लगती है। [2]
घन की घोर गर्जन तथा दामिनी की दमकन से भयभीत हो सुकुमारी श्रीप्रियाजी प्रियतम के हृदय से लिपट जाती हैं। श्रीभट्टजी जय-जयकार करते हुए युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम की उस समय की छवि को निहार अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। [ इस प्रकार श्रावण मास में श्रीप्रियाप्रियतम सखियों को हिंडोला- झूलन का सुख विविध प्रकार से प्रदान करते हैं। ] [3]

