खेलत हँसत वनराज मैं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (30)

खेलत हँसत वनराज मैं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (30)

(कवित्त)
खेलत हँसत वनराज मैं विहारी प्यारी,
नाना खग मण्डली की सोभा मन भावे हैं। [1]
निरत दिखावें केते गगन उड़ावे लखि,
लाडली बुलावें तिने सीघ्र फिरि आवैं है॥ [2]
कोमल मधुर तोड़ तोड़ फल लावे सो सो,
सबै बनरानी जू की भेंट लै चढ़ावै हैं। [3]
'लाल बलबीर' उर दम्पति बढ़ावै सुख,
अति ही सजीले सुर राधा गुन गावै हैं॥ [4]   
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (30)

जहाँ वृंदावन में श्री प्रिया-प्रियतम नित्य विहार करते हैं, वहाँ अनेक प्रकार के खग मंडली खेलते-हँसते हुए इस वनराज की शोभा बढ़ाते हैं। [1]

कभी वे नृत्य दिखाते हैं, कभी गगन में उड़ जाते हैं, और जब श्री लाडिली जी बुलाती हैं, तो शीघ्र ही आ जाते हैं। [2]

वनराज के सुंदर एवं कोमल फलों को तोड़-तोड़ कर लाते हैं और वनरानी ठकुरानी श्री राधिका रानी को भेंट चढ़ाते हैं। [3]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि यह खग मंडली अति अद्भुत रूप से दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण का प्रेम बढ़ाती है और अति मधुर स्वर में श्री "राधा" का गुणगान करती है। [4]