कुंज गली में अली निकसी - श्री रसखान

कुंज गली में अली निकसी - श्री रसखान

(सवैया)
कुंज गली में अली निकसी, तहाँ साँवरे ढोटा कियौ भटभेरो। [1]
माई री वा मुख की मुसकान, गयौ मन बूढ़ि फिरै नहीं फेरौ॥ [2]
डोरि लियौ दृग चोरि लियौ, चित डारयौ है प्रेम के फंद घनेरो। [3]
कैसे करों अब क्यों निकसौं, रसखानि परयौ तन रूप को घेरो॥ [4]
- श्री रसखान

कुंज की गली में जब मैं (गोपी देह धारी) निकली, वहीं सांवरे श्याम ने अचानक सामने आकर मेरा मार्ग रोक लिया। [1]

माई री! उस मुख की मुस्कान ने मेरा मन ऐसा हर लिया कि अब उसे लौटाया नहीं जा सकता। [2]

उसने अपनी आँखों से डोर डालकर और नैनों से चुराकर मेरे चित्त को बाँध लिया है, प्रेम के फंदे में मुझे कसकर जकड़ लिया है। [3]

अब मैं क्या करूँ, कैसे निकलूँ? रसखान कहते हैं —उस रूप की बाढ़ ने मुझ गोपी के तन-मन को चारों ओर से घेर लिया है। [4]