राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (117)

राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (117)

राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां, प्रीतः स्वं भजतोपि निर्भरमहाप्रेम्णाधिकं सर्वशः । 
आलिंगत्यथ चुम्बति स्ववदनात्ताम्बूलमास्येर्पये त्कण्ठे स्वां वनमालिकामपि मम न्यस्येत्कदा मोहनः ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (117)

श्रीराधा के चरणकमलों में अचल और निष्कपट भक्ति देखकर मोहन (श्रीश्यामसुन्दर) अतिशय महाप्रेम से सर्वात्मना अपना भजन करने वालों से भी अधिक प्रसन्न होकर, उसे (श्रीराधा भक्त को) आलिंगन करते हैं, चुम्बन करते हैं, अपने मुखसे उसके मुख में ताम्बूल (पान का बीड़ा) देते हैं तथा उसके कण्ठ में अपनी वनमाला पहिना देते हैं। ऐसा वे (श्रीमोहन) मेरे प्रति भी कब करेंगे ?