(राग विलावल )
आवत लाल-प्रिया भुज जोरैं।
डगमगात आरस रस भीने, अति सुरंग नैननिं की कोरैं ।।[1]
चितवन सहज चारु अति चंचल, मुसिकनिं मंद मिथुन-चित चोरैं।
'हित ध्रुव' निरखि रसिक ललितादिक, डारि वारि प्रान तृन तोरैं ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (9)
श्री प्रिया लाल परस्पर बाहुबद्ध हुए निकुञ्ज-भवन से निकल कर आ रहे हैं। वे आलस्य के रस में भींगे हुए डगमगाते हुए चल रहे हैं। उनकी नेत्र-तटी अरुणिम है। [1]
उनकी चितवन स्वाभाविक ही सुन्दर एवं अतिशय चञ्चल है तथा मन्द मधुर मुस्कान परस्पर में दोनों का चित्त चुरा रही है।
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि ललितादि रसिक सखियाँ युगल की इस छवि का अवलोकन कर अपने प्राणों को न्यौछावर करती हुई तृण तोड़ती हैं । [2]

