(राग सारंग)
गिरिधर जब अपनौं कर जानें।
ताको मन भक्तन की सेवा भक्त चरन रज सदा लुभाने ।। [1]
भक्तन में मति भक्तन में गति हरिजन हरि एक कर मानें।
'कृष्णदास' मन-वचन-क्रम करि हरि जन संगे हरि उर आने ।। [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1076)
जब भक्त श्री गिरिधर लाल को मन से अपना मान लेता है तो स्वाभाविक ही उस जन का मन भक्तों की सेवा, भक्तों की चरण रज प्राप्त करने के लिए सदा लालायित रहता है । [1]
वह हरि और हरि भक्तों में भेद नहीं मानेगा, और भक्तों को ही अपनी वास्तविक गति एवं मति मानेगा । वह भाग्यशाली जीव मन क्रम वचनों से हरि और हरिजन को समान मान देगा एवं हरि अपने भक्तों संग उसके हृदय में निवास करेंगे। [2]
ध्यान दें :
(इस पद में जिन भक्तों को हरि के समान मानने को कहा गया है वह भगवद प्राप्त संतों के लिए कहा है।)
गिरिधर जब अपनौं कर जानें।
ताको मन भक्तन की सेवा भक्त चरन रज सदा लुभाने ।। [1]
भक्तन में मति भक्तन में गति हरिजन हरि एक कर मानें।
'कृष्णदास' मन-वचन-क्रम करि हरि जन संगे हरि उर आने ।। [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1076)
जब भक्त श्री गिरिधर लाल को मन से अपना मान लेता है तो स्वाभाविक ही उस जन का मन भक्तों की सेवा, भक्तों की चरण रज प्राप्त करने के लिए सदा लालायित रहता है । [1]
वह हरि और हरि भक्तों में भेद नहीं मानेगा, और भक्तों को ही अपनी वास्तविक गति एवं मति मानेगा । वह भाग्यशाली जीव मन क्रम वचनों से हरि और हरिजन को समान मान देगा एवं हरि अपने भक्तों संग उसके हृदय में निवास करेंगे। [2]
ध्यान दें :
(इस पद में जिन भक्तों को हरि के समान मानने को कहा गया है वह भगवद प्राप्त संतों के लिए कहा है।)

