अनहाये कबहूँ नहीं, न्हाये रहत सु नित्त।
सुद्ध करें सब सुद्ध कौं, कुंजबिहारिन मित्त॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (302)
ऐसे रसिक, जिनकी एकमात्र मित्रता निकुञ्ज-विहारिणी श्री किशोरीजी से ही है, वे कभी भी अनहाये [अपवित्र अवस्था] में नहीं रहते। वे तो सदा ही नहाये हुए रहते हैं और स्वयं शुद्ध होने के साथ-साथ दूसरों को भी शुद्ध करने वाले होते हैं।

