छबि थी छबि रासि के सन्मुख, जो वह दीखती है छवि आज यहाँ।
बन बीथिया वृक्षलता द्रुम है, सब सुन्दर साज समाज यहाँ॥ [1]
अति पावन प्रेम का भाव लिये, रहता नित ही रसराज यहाँ।
बहती रस की सरिता बृज में, रहते अब भी बृजराज यहाँ॥ [2]
- ब्रज के सेवैयाँ
ब्रजधाम अनंत महिमा से युक्त है, जहाँ हर ओर केवल सुंदरता ही बिखरी है, मानो यह धाम स्वयं सुंदरता का पुंज हो। यहाँ की समस्त गलियाँ और बीथियाँ वृक्षों और लताओं से आच्छादित हैं, और यहाँ के समाज का हर दृश्य मनोहारी है। [1]
यही वह धाम है जहाँ रसराज श्रीकृष्ण नित्य परम-पावन प्रेम भाव से रस बरसाते हैं। ब्रजभूमि में रस की अविरल सरिता प्रवाहित होती है, जहाँ आज भी ब्रजराज श्रीकृष्ण साक्षात विराजते हैं और अपने प्रेमरस से समस्त जीवों को आनन्दमग्न करते हैं। [2]
यही वह धाम है जहाँ रसराज श्रीकृष्ण नित्य परम-पावन प्रेम भाव से रस बरसाते हैं। ब्रजभूमि में रस की अविरल सरिता प्रवाहित होती है, जहाँ आज भी ब्रजराज श्रीकृष्ण साक्षात विराजते हैं और अपने प्रेमरस से समस्त जीवों को आनन्दमग्न करते हैं। [2]

