या मन के अवलंब हित - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (114)

या मन के अवलंब हित - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (114)

या मन के अवलंब हित, कीन्हौं आहि उपाय।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (114)

मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है, जिससे श्री वृन्दावन-रस का वर्णन करते हुए मन और बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।