अनोखी, वीणा वारी नारि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा,  लीला-माधुरी (1)

अनोखी, वीणा वारी नारि - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, लीला-माधुरी (1)

अनोखी, वीणा वारी नारि। [1]
जाकी लखि श्रृंगार माधुरी, अगनित रति बलिहार । 
चिबुक पाणि धरि कुसुम सरोवर, बैठी वीणावारि ।। [2]
पूछति लली, ‘अली तू को है? काकी है घरवारि?’ । 
‘हौं लाली! हौं देवलोक की, अब लौं अहौं कुमारि ।। [3]
यह संसार असार जानि हम, उर विराग लिय धारि’ । 
लली कहीं ‘चल, महल हमारे, करिहौं टहल तिहारि’ ।। [4]
‘हमहिं लली! लै चलि सक जो मम, आदेशहिं नहिं टारि ।  
‘हाँ’ करि, चलीं ‘कृपालु’ छली सँग, भोरी भानुदुलारि ।। [5]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा,  लीला-माधुरी (1)

श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं । [1]

जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी वीणा वाली नारी ठोढ़ी पर हाथ रखे हुए कुसुम सरोवर पर बैठी हैं। [2]

किशोरी जी अचानक वहीं पहुँचकर उससे पूछती हैं, अरी वीणावाली! तू कौन है एवं किसकी स्त्री है? वीणा वाली ने कहा कि मैं देवलोक की हूँ और अभी तक कुमारी हूँ।[3] 

इस संसार को असार समझ कर मैंने वैराग्य धारण कर लिया है। किशोरी जी ने कहा अरी वीणा वाली! तू मेरे महल में चल कर रह, मैं स्वयं तेरी सेवा करूँगी। [4] 

वीणावाली ने कहा, हे किशोरी जी! हमको वही अपने घर ले जा सकता है जो मेरी एक भी आज्ञा न टाले। किशोरी जी ने स्वीकार कर लिया एवं ‘श्री कृपालु जी’ के कथनानुसार अपने भोलेपन के कारण श्यामसुन्दर से ठगी गयीं। [5]