अपरतः पुरुषार्थचतुष्टय भगवतो भजनञ्च भवेद्वहु।
ध्रुवमिदन्तु विना वृषभानुजावनमहो न महोज्ज्वलं भक्तयः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (15.24)
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-ये चतुष्टय पुरुषार्थ अन्य अन्य स्थानों पर प्राप्त किये जा सकते हैं एवं भगवान् को बहुविध भजन हो सकता है, किंतु यह निश्चित है कि इस श्रीराधा कानन (श्रीवृन्दावन) को छोड़कर और किसी स्थान पर भी महा-उज्ज्वल रस अर्थात् श्रृंगार रस-गर्भित भक्ति नहीं प्राप्त हो सकती।

