राधे बहुत भई अब माफ़ करो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (27)

राधे बहुत भई अब माफ़ करो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (27)

(राग सोरठि)
राधे बहुत भई अब माफ़ करो ।
श्री वृंदावन सुख दरसावहु ऊक चूक उरमें न धरो ।। [1]
अपनो करि जन नाहिं निवारो ता प्रणतें अवहू न टरो ।
ललित किशोरी गिनौ न औगुन निज करुना की टरनि टरौ ।। [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (27)
     
हे श्री राधे, अब बहुत हो गया, अब तो हमें हमारे अपराधों से माफ़ कर अपने निज वृंदावन का सुख दरसाओ । [1]

आपने अपना हमें बना लिया है तो अब आप अपने प्रण से मत हटो। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे स्वामिनी, हमारे अवगुणों की ओर न निहारो, अपनी निज करुणा की ओर निहार कर हमारा कल्याण करो। [2]