कृष्णामृतं चल विगाढुमितीरिताहं तावत्सहस्व रजनी सखि यावदेति ।
इत्थं विहस्य वृषभानुसुतेह लप्स्ये मानं कदा रसदकेलिकदम्बजातम् ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (14)
जब श्री राधा मुझसे कहेंगी- "अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत अवगाहन करने के लिए चल" । तब मैं हँसकर कहूँगी- "हे सखि ! तब तक धैर्य्य रखो जब तक रात्रि नहीं आ जाती।" (क्योंकि कृष्णामृत अवगाहन तो रात्रि में ही अधिक उपयुक्त है ?) उस समय मेरे हास-मय वचनों से रसदायक केलि-समूह का एक अनुपम आनन्द उत्पन्न होगा। मैं कब श्रीवृषभानु नन्दिनी से इस रसमय सम्मान की अधिकारिणी होऊँगी ?
इत्थं विहस्य वृषभानुसुतेह लप्स्ये मानं कदा रसदकेलिकदम्बजातम् ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (14)
जब श्री राधा मुझसे कहेंगी- "अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत अवगाहन करने के लिए चल" । तब मैं हँसकर कहूँगी- "हे सखि ! तब तक धैर्य्य रखो जब तक रात्रि नहीं आ जाती।" (क्योंकि कृष्णामृत अवगाहन तो रात्रि में ही अधिक उपयुक्त है ?) उस समय मेरे हास-मय वचनों से रसदायक केलि-समूह का एक अनुपम आनन्द उत्पन्न होगा। मैं कब श्रीवृषभानु नन्दिनी से इस रसमय सम्मान की अधिकारिणी होऊँगी ?

