मन मेरौ बार-बार अभिलाखै। [1]
ऐसौ भाग जागिहै कबहूँ, रूप माधुरी चाखै।
रचि-रचि विमल माल पहिरावै, रस की बतियाँ भाखै॥ [2]
नित-नित नव-नव लाड़ लड़ावत, पुतरिन लौं दृग राखै।
तन मन पल-पल वारत 'भोरी', निगम श्रृंखला नाखै॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (135)
हे प्यारी जू ! मेरे मन में बार-बार अनेकानेक अभिलाषायें उठती रहती हैं। [1]
मुझे वह सौभाग्य कब प्राप्त होगा, जब मैं आपकी रूप माधुरी का निरन्तर पान कर सकूँ?
आपके लिये फूलों एवं मोतियों की माला की रचना कर उन्हें आपको धारण करा सकूँ? आपके साथ मिल-जुलकर रस भरी बातें कर सकूँ? [2]
आपको प्रतिदिन नये-नये लाड़ लड़ा सकूँ ? नेत्रों की पुतलियों की भाँति आपको अपने नेत्रों के अन्दर छिपाकर रख सकूँ?
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि वेद-शास्त्रों में विधि-निषेध सम्बन्धी कही गई बातों की उपेक्षा करते हुए, मैं तो आपके ऊपर अपने तन-मन-प्राणों को प्रति पल न्यौछावर कर देना चाहती हूँ। [3]
ऐसौ भाग जागिहै कबहूँ, रूप माधुरी चाखै।
रचि-रचि विमल माल पहिरावै, रस की बतियाँ भाखै॥ [2]
नित-नित नव-नव लाड़ लड़ावत, पुतरिन लौं दृग राखै।
तन मन पल-पल वारत 'भोरी', निगम श्रृंखला नाखै॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (135)
हे प्यारी जू ! मेरे मन में बार-बार अनेकानेक अभिलाषायें उठती रहती हैं। [1]
मुझे वह सौभाग्य कब प्राप्त होगा, जब मैं आपकी रूप माधुरी का निरन्तर पान कर सकूँ?
आपके लिये फूलों एवं मोतियों की माला की रचना कर उन्हें आपको धारण करा सकूँ? आपके साथ मिल-जुलकर रस भरी बातें कर सकूँ? [2]
आपको प्रतिदिन नये-नये लाड़ लड़ा सकूँ ? नेत्रों की पुतलियों की भाँति आपको अपने नेत्रों के अन्दर छिपाकर रख सकूँ?
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि वेद-शास्त्रों में विधि-निषेध सम्बन्धी कही गई बातों की उपेक्षा करते हुए, मैं तो आपके ऊपर अपने तन-मन-प्राणों को प्रति पल न्यौछावर कर देना चाहती हूँ। [3]

