जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य मुरलीं हरेः।
क्षिप्तां मयि त्वया देवि गोपयिष्यामि तां कदा? ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80)
हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?
क्षिप्तां मयि त्वया देवि गोपयिष्यामि तां कदा? ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80)
हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?

