देखा देखी रसिक न ह्वैहैं, यह मारग है बंका - श्री हित वृंदावन दास जी, युगल स्नेह पत्रिका (111)

देखा देखी रसिक न ह्वैहैं, यह मारग है बंका - श्री हित वृंदावन दास जी, युगल स्नेह पत्रिका (111)

देखा देखी रसिक न ह्वैहैं, यह मारग है बंका। [1]
कहा सिंह की सरवर करिहै, गीदड़ फिरै जो रंका ।। [2]
असहन निन्दा करत पराई, कबहुँ न मानी शंका। [3]
वृन्दावन हित रूप अनन्य रसिक जिन दीन्ह पथ को डंका ।। [4]

- श्री हित वृंदावन दास जी, युगल स्नेह पत्रिका (111)

श्री राधा कृष्ण के रसिक भक्तों को देख कर उनकी नक़ल करने से कोई रसिक कैसे हो सकता है, यह रस का मार्ग तो बड़ा टेड़ा है। [1]

गीदड़ तो भय से वन-वन अकेला भटकता है, वह भला सिंह की बराबरी कैसे कर सकता है। [2]

जिनका ह्रदय भक्ति से शून्य है, वह स्वयं को रसिक मानकर, दूसरे भक्तों की निंदा करते हैं जिसमें वह कभी अपनी गलती भी नहीं मानते कि वह दोष दर्शन कर रहे हैं । [3]

श्री हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि इतने पर भी डंके की चोट पर स्वयं को अनन्य रसिक कहते फिरते हैं। [4]