दृग सों नाव निहार के - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (47)

दृग सों नाव निहार के - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (47)

दृग सों नाव निहार के, पुनि गज होय अरूढ़।
भोगन ते तरिबो चहै, नारायण मति मूढ़॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (47)

जो साधक सत्संग के प्रभाव से इस मिथ्या संसार से पार कराने वाली नौका अर्थात् श्री राधा-कृष्ण की शरणागति को देख कर भी अपने अभिमान के शिखर पर चढ़ जाता है और यह सोचता है कि वह विषय-भोग से स्वयं ही मुक्त हो जाएगा; ऐसा मनुष्य महा मूर्ख है।