प्रीति की रीति को पैंड़ो ही न्यारो॥ [1]
कै जानत वृषभानुनंदिनी, कै जानत यह कान्हर कारो। [2]
सहजे प्रीति न होय सखी री, यह अपने मन सोच विचारों॥ [3]
प्रेम पंथ को तो चलन बांकुरों, रसिक बिना को समझन वारो। [4]
सूरदास यह प्रीति कठिन है, सीस दिये भी न होत निवारो॥ [5]
- श्री सूरदास, सूर सागर
श्री राधा कृष्ण के प्रेम मार्ग की गति ही न्यारी है ।[1]
प्रेम के इस मार्ग को या तो वृषभानु नंदिनी श्री राधा जानती हैं या नन्द के दुलारे श्री श्यामसुंदर ही जानते हैं। [2]
इस दिव्य प्रेम की प्राप्ति बहुत सहजता से नहीं होती, (इसके लिए पूर्ण समर्पण की अवशक्ता है) साधक को यह भली प्रकार अपने ह्रदय में धारण करना चाहिए। [3]
इस प्रेम पथ पर चलना ही बढ़ा टेड़ा है, बिना रसिकों एवं उनकी कृपा के इसे कौन समझ सकता है? [4]
श्री सूरदास जी कहते हैं "इस मार्ग पर बिना सर्वस्व न्योछावर किये प्रेम प्राप्ति दुर्लभ है"। [5]
कै जानत वृषभानुनंदिनी, कै जानत यह कान्हर कारो। [2]
सहजे प्रीति न होय सखी री, यह अपने मन सोच विचारों॥ [3]
प्रेम पंथ को तो चलन बांकुरों, रसिक बिना को समझन वारो। [4]
सूरदास यह प्रीति कठिन है, सीस दिये भी न होत निवारो॥ [5]
- श्री सूरदास, सूर सागर
श्री राधा कृष्ण के प्रेम मार्ग की गति ही न्यारी है ।[1]
प्रेम के इस मार्ग को या तो वृषभानु नंदिनी श्री राधा जानती हैं या नन्द के दुलारे श्री श्यामसुंदर ही जानते हैं। [2]
इस दिव्य प्रेम की प्राप्ति बहुत सहजता से नहीं होती, (इसके लिए पूर्ण समर्पण की अवशक्ता है) साधक को यह भली प्रकार अपने ह्रदय में धारण करना चाहिए। [3]
इस प्रेम पथ पर चलना ही बढ़ा टेड़ा है, बिना रसिकों एवं उनकी कृपा के इसे कौन समझ सकता है? [4]
श्री सूरदास जी कहते हैं "इस मार्ग पर बिना सर्वस्व न्योछावर किये प्रेम प्राप्ति दुर्लभ है"। [5]

