जिहिं कुंजन रास विलास करौ, तिहि कुँजन फेरी फिरुँ नित मैं। [1]
जिहि मंदिर आप निवास करौ, तिहि पौर पै शीष धरूँ नित मैं॥ [2]
वृषभानु सुता ब्रजचंद्र प्रिया, तिनकी हिय आस करूँ नित मैं। [3]
उर ध्यावत है मुनि बृंद जिन्हें पद पंकज तेहि परूँ नित मैं॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे श्री श्यामा-श्याम! जिस निकुंज में आपका रास-विलास हो रहा हो, मैं उस निकुंज की प्रतिदिन प्रदक्षिणा करूँ। [1]
जिहि मंदिर आप निवास करौ, तिहि पौर पै शीष धरूँ नित मैं॥ [2]
वृषभानु सुता ब्रजचंद्र प्रिया, तिनकी हिय आस करूँ नित मैं। [3]
उर ध्यावत है मुनि बृंद जिन्हें पद पंकज तेहि परूँ नित मैं॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे श्री श्यामा-श्याम! जिस निकुंज में आपका रास-विलास हो रहा हो, मैं उस निकुंज की प्रतिदिन प्रदक्षिणा करूँ। [1]
आप जिस मंदिर में निवास करते हों, मैं उस मंदिर की पावन देहरी पर नित्य अपना शीश नवाऊँ। [2]
मैं अपने हृदय में सदा वृषभानु-नंदिनी श्री राधा और ब्रजचंद्र श्रीकृष्ण की ही आशा धारण किए रहूँ। [3]
जिन्हें प्राप्त करने के लिए मुनिगण भी ध्यान में लीन रहते हैं, मैं उन चरण-कमलों में प्रतिदिन अपनी वंदना अर्पित करूँ। [4]
जिन्हें प्राप्त करने के लिए मुनिगण भी ध्यान में लीन रहते हैं, मैं उन चरण-कमलों में प्रतिदिन अपनी वंदना अर्पित करूँ। [4]

