(राग विभास)
दुहुँनि की सहज बिसाँति दोऊ मिलि सतरंज खेलत। [1]
उर रुख नैंन चपल अस्व चतुर बराबरि झेलत॥ [2]
आतुरता फील पयादे निग्रह
फरजी चौंप अनूपम पेलत। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
सह साह राखैं खेलत॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (81)
हरिदासी सखी अन्य सखी से कह रही हैं। श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिनी एक संग सहज ही रसमय केलिपरायण हो शतरंज की मधुर विसाँति (बिछौना) बिछा खेल खेल रहे हैं। [1]
जिसमें ह्रदय रूपी हाथी, चंचल नयन रूपी अस्व, अपने खेल में बड़ी चतुरता एवं बराबरी से बढ़ रहे हैं। [2]
शतरंज के सभी अंग अर्थात हाथी, प्यादे वजीर इत्यादि अपनी अपनी चाल चल रहे हैं। [3]
श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी खेल में बादशाह को मात देते हैं फिर भी शतरंज का खेल पूरा नहीं हो रहा है। राधारानी की रुचि को देखते हुए कुंजबिहारी पल पल खेल बढ़ाते जा रहे हैं। [4]
दुहुँनि की सहज बिसाँति दोऊ मिलि सतरंज खेलत। [1]
उर रुख नैंन चपल अस्व चतुर बराबरि झेलत॥ [2]
आतुरता फील पयादे निग्रह
फरजी चौंप अनूपम पेलत। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
सह साह राखैं खेलत॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (81)
हरिदासी सखी अन्य सखी से कह रही हैं। श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिनी एक संग सहज ही रसमय केलिपरायण हो शतरंज की मधुर विसाँति (बिछौना) बिछा खेल खेल रहे हैं। [1]
जिसमें ह्रदय रूपी हाथी, चंचल नयन रूपी अस्व, अपने खेल में बड़ी चतुरता एवं बराबरी से बढ़ रहे हैं। [2]
शतरंज के सभी अंग अर्थात हाथी, प्यादे वजीर इत्यादि अपनी अपनी चाल चल रहे हैं। [3]
श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी खेल में बादशाह को मात देते हैं फिर भी शतरंज का खेल पूरा नहीं हो रहा है। राधारानी की रुचि को देखते हुए कुंजबिहारी पल पल खेल बढ़ाते जा रहे हैं। [4]

