श्री घनानन्द जी का जीवन परिचय

श्री घनानन्द जी का जीवन परिचय

परिचय :
रीतिकाल की तीन प्रमुख काव्यधाराओं-रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त में घनानन्द अंतिम काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिमुक्त घनानन्द का समय सं. 1746 तक माना है। इस प्रकार आलोच्य घनानन्द वृंदावन के आनन्दघन हैं। कवि का मूल नाम आनन्दघन ही रहा होगा, परंतु छंदात्मक लय-विधान इत्यादि के कारण ये स्वयं ही आनन्दघन से घनानन्द हो गए। उनके आध्यात्मिक गुरु श्री वृंदावन देवाचार्य थे जो उस समय के निम्बार्क संप्रदाय के एक महान आचार्य थे।

घनानन्द का जीवन-वृत्त :
जन्म: 1689 ईसवी (लगभग)

कवि घनानन्द का प्रेमवत्सल हृदय अपने प्रेमी की महिमा का वर्णन करने में ही मग्न रहता था, अपने लिए कुछ लिखने का उनके पास अवकाश ही कहाँ रहा होगा ?
घनानन्द के काव्य में ‘सुजान’ का ही वर्णन मिलता है- पर यह सुजन कौन थी, इसका विवेचन भी आवश्यक हो जाता है । घनानन्द मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार में खास-कलम (प्राइवेट सेक्रेटरी) थे । इस पर भी - फारसी में माहिर थे- एक तो कवि और दूसरे सरस गायक । प्रतिभासंपन्न होने के कारण बादशाह का इन पर विशेष अनुग्रह था । मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार की एक नृत्य-गायन विद्या में निपुण सुजान नामक वेश्या से इनको प्रेम हो गया । इधर सुजान की इन पर अनुरक्ति और दूसरी ओर बादशाह के खास-कलम-इन दोनों बातों से-घनानन्द की उन्नति से सभी दरबारी मन ही में ईर्ष्या करते थे । अंततः उन्होंने एक ऐसा षड्यंत्र रचा, जिसमें घनानन्द पूरी तरह से लुट गए । दरबारी लोगों ने मुहम्मदशाह रंगीले से कहा कि घनानन्द बहुत अच्छा गाते हैं। उनकी बात मानकर बादशाह ने एक दिन इन्हें गाने के लिए कहा, पर ये इतने स्वाभिमानी और मनमौजी व्यक्ति थे कि गाना गाने से इन्होंने इनकार कर दिया । दरबारी लोगों को इस बात का पता था कि बादशाह के कहने से ये कभी गाना नहीं गाएँगे और हुआ भी वही। दरबारी लोग इसी घड़ी की तो प्रतीक्षा कर रहे थे। उनहोंने बादशाह से कहा कि यदि सुजान को बुलाया जाए और वह घनानन्द से अनुरोध करे तो ये अवश्य गाना गाएँगे और यह हुआ भी। बादशाह की आज्ञा से सुजान वेश्या दरबार में बुलाई गई और उसके कहने पर घनानन्द ने गाना सुनाया - सुजान की ओर मुँह करके और बादशाह की और पीठ करके, परंतु इतनी तन्मयता से गाना सुनाया कि बादशाह और सभी दरबारी मंत्र-मुग्ध हो गए। परंतु बादशाह जितने ही आनंद-विभोर गाना सुनते समय हुए थे, उतने ही कुपित गाना समाप्त होने के बाद हुए । यह उनकी बेअदबी थी कि सुजान का कहा उनसे बढ़कर हो गया । फलतः क्रोधित  होकर उन्होंने तत्काल घनानन्द को दरबार व राज्य छोड़ने का आदेश दिया । दरबारियों की चाहत पूर्ण हो चुकी थी ।
घनानन्द ने चलते समय सुजान से साथ चलने का आग्रह किया, परंतु उसने अपने जातीय गुण की रक्षा की और घनानन्द के साथ जाना अस्वीकार कर दिया । जान और जहान दोनों ही लुटाकर घनानन्द ने वृंदावन की ओर मुख किया । जीवन से इन्हें पूर्ण विरक्ति हो चुकी थी । वृंदावन में उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षा ली एवं श्री राधा कृष्ण की पूर्ण शरणागति प्राप्त की । घनानन्द के जीवन का अंतिम समय वृंदावन में बीता ।

मुत्यु :
अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर पहला आक्रमण सं.1813 में और दूसरा आक्रमण सं.1817 में किया था । इन दोनों आक्रमणों का वर्णन हमें चाचा हितवृंदावनदास कृत ‘हरिकला बेलि’ में मिलता है-

ठारह सै सत्रहौं वर्ष गत जानियै ।
साढ़ वदी हरिबासर बेल बखानियै ।।

इन आक्रमणों में अनेक महान् हस्तियों व संतों का वध कर डाला गया था । सं. 1817 मे चाचा हितवृंदावनदास जी ने घनानन्द का शव अपनी आँखों से देखा और उनके शव पर दुखी होते हुए इस प्रकार उसका वर्णन किया-

विरह सौं तायौ तन निबाह्मौ गत साँचौ पर,
धन्य आनन्दघन मुख गाई सोई करी है ।
एह्मे ब्रजराज कुँवर धन्य-धन्य तुमहूँ की
कहा नीकी प्रभु यह जंग में बिस्तरी है ।
गाढ़ौ ब्रज उपासी जिन देह अंत पूरी पारी
रज की अभीलाष सौं तहाँ ही देह धरी है ।।
वृंदावन हित रुप तुमहूँ हरि उड़ाई धूरि,
ऐ पै साँची निष्ठा जन ही की लखि परी है ।

घनानन्द  की अभिलाषा थी कि वे ब्रज-रज में लोटते हुए ही अपने प्राण त्यागें और उनकी यह इच्छा भगवान कृष्ण ने पूरी कर दी । इस बात की पुष्टि ‘राधा-कृष्ण ग्रंथावली’ में एक स्थान पर मिलती है- "सुना है, मथुरा में कत्लेआम करने वालों से उन्होंने कहा कि मुझे तलवार के घाव थोड़ी-थोड़ी देर तक दो । इनको ज्यों-ज्यों तलवार के घाव लगते गए, त्यों-त्यों ये ब्रज-रज में लोटते रहे और ऐसे देह त्याग दी ।"

रचनाएँ :
घनानंद द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 41 बताई जाती है-

सुजानहित, कृपाकंदनिबंध, वियोगबेलि, इश्कलता, यमुनायश, प्रीतिपावस, प्रेमपत्रिका, प्रेमसरोवर, व्रजविलास, रसवसंत, अनुभवचंद्रिका, रंगबधाई, प्रेमपद्धति, वृषभानुपुर सुषमा, गोकुलगीत, नाममाधुरी, गिरिपूजन, विचारसार, दानघटा, भावनाप्रकाश, कृष्णकौमुदी, धामचमत्कार, प्रियाप्रसाद, वृंदावनमुद्रा, व्रजस्वरूप, गोकुलचरित्र, प्रेमपहेली, रसनायश, गोकुलविनोद, मुरलिकामोद, मनोरथमंजरी, व्रजव्यवहार, गिरिगाथा, व्रजवर्णन, छंदाष्टक, त्रिभंगी छंद, कबित्तसंग्रह, स्फुट पदावली और परमहंसवंशावली।

घनानंद ग्रंथावली में उनकी 16 रचनाएँ संकलित हैं। घनानंद के नाम से लगभग चार हजार की संख्या में कवित्त और सवैये मिलतें हैं। इनकी सर्वाधिक लोकप्रिय रचना 'सुजान हित' है, जिसमें 507 पद हैं। इन में सुजान के प्रेम, रूप, विरह आदि का वर्णन हुआ है। सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध, रसकेलि वल्ली आदि प्रमुख हैं। उनकी अनेक रचनाओं का अंग्रेज़ी अनुवाद भी हो चुका है।