देख्यौ देख्यौ राधा को बृंदावन देख्यौ ।
जीवन जनम करम अपनो सब भाँति सफल करि लेख्यौ ।। [1]
जमुना के तट सजल स्यामघन सब दिन सहज सुहायौ ।
दंपति सुख-संपत्ति निज मंदिर हित-मंडप नित छायौ ।। [2]
सब तें ऊँचो लसत पुहमि पै दीसत दूरि दुरायौ ।
अमल अखंडित अतुलित महिमा अदभुत निगमनि गायौ ।। [3]
मोहन महा मदनमोहन को बानक बरनौं कैसे ।
दरस्यौ बरस्यौ करौ सदाई आनँदघन यह ऐसे ।। [4]
- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (690)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "मैंने श्री राधा रानी का वृन्दावन देख लिया है, जिससे मेरा जीवन सब प्रकार से सफल हो गया है। [1]
यमुना किनारे युगल दम्पति श्री राधा श्यामसुंदर सदैव सहज रूप से अपने निज मंदिर में विराजमान हैं, जहाँ नित्य हित मंडप छाया हुआ है, जिसका दर्शन बड़ा ही सुहावना है। [2]
श्री वृन्दावन की भूमि सबसे ऊँचे स्थित है, सबकी दृष्टि से अगोचर है, जो अमल है, अखंडित है, अतुल्य, गुणातीत है, जिसकी कोई तुलना नहीं है, जिसकी अद्भुत महिमा आगम - निगम ने गायी है। [3]
श्री श्यामसुंदर का वेश मदन को भी मोहने वाला है, जिसे भी दिखाई देते हैं, उसपर अपने नैन कटाक्ष की वर्षा करते हैं, इनका वर्णन कैसे संभव है।" [4]
जीवन जनम करम अपनो सब भाँति सफल करि लेख्यौ ।। [1]
जमुना के तट सजल स्यामघन सब दिन सहज सुहायौ ।
दंपति सुख-संपत्ति निज मंदिर हित-मंडप नित छायौ ।। [2]
सब तें ऊँचो लसत पुहमि पै दीसत दूरि दुरायौ ।
अमल अखंडित अतुलित महिमा अदभुत निगमनि गायौ ।। [3]
मोहन महा मदनमोहन को बानक बरनौं कैसे ।
दरस्यौ बरस्यौ करौ सदाई आनँदघन यह ऐसे ।। [4]
- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (690)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "मैंने श्री राधा रानी का वृन्दावन देख लिया है, जिससे मेरा जीवन सब प्रकार से सफल हो गया है। [1]
यमुना किनारे युगल दम्पति श्री राधा श्यामसुंदर सदैव सहज रूप से अपने निज मंदिर में विराजमान हैं, जहाँ नित्य हित मंडप छाया हुआ है, जिसका दर्शन बड़ा ही सुहावना है। [2]
श्री वृन्दावन की भूमि सबसे ऊँचे स्थित है, सबकी दृष्टि से अगोचर है, जो अमल है, अखंडित है, अतुल्य, गुणातीत है, जिसकी कोई तुलना नहीं है, जिसकी अद्भुत महिमा आगम - निगम ने गायी है। [3]
श्री श्यामसुंदर का वेश मदन को भी मोहने वाला है, जिसे भी दिखाई देते हैं, उसपर अपने नैन कटाक्ष की वर्षा करते हैं, इनका वर्णन कैसे संभव है।" [4]

