(दोहा)
नषसिष सुषमा के दोउ, रतनागर रसिकेस।
अद्भुत राधामाधवी, जोरी सहज सुदेस॥
(पद) [तिताल, राग - केदारौ]
राधामाधव अद्भुत जोरी।
सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1]
नष सिष सब सुषमा रतनागर भरत रसिकवर हृदय सरोरी।
जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल, गंड वलय मिलि लसत हिलोरी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (56)
(दोहा)
श्रीराधा-माधव के नख से शिख तक शोभा का सागर लहलहाता दिखाई देता है। रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी अपनी सहज स्वाभाविक सुषमा से रसिकजनों के मन को मोह लेती है।
श्रीभट्टजी अपने परमाराध्य श्रीयुगलकिशोर का गुणगान करते हुए कहते हैं—
(पद)
(श्रीवृन्दावन में नित्य प्रति विहार करने वाली) श्रीराधामाधव की यह जोड़ी परम अद्भुत है। जिनका नित्य बिहार सदा-सनातन, एकरस एवं अविचल है, ऐसे नवलकिशोर किशोरी श्रीराधा माधव की यह जोड़ी अङ्ग प्रत्यङ्गादि सर्वप्रकार से नख-शिख की शोभा के सार-समुद्र के रूप में वर्तमान होने के कारण परम अद्भुत है।[1]
जिस प्रकार समुद्र अपने समीपस्थ सरोवरादि को उमड़ कर तथा दूरस्थ नद-नदी आदि को मेघ द्वारा बरस कर भर देता है, उसी प्रकार श्री प्रिया प्रियतम अपनी निकटवर्ती सखीजनों के हृदय रूपी सरोवर को अपनी शोभा से आप्लावित कर देते हैं और सहचरियाँ श्रीप्रियाप्रियतम की रूप- माधुरी का पान कर अन्यान्य रसिकजनों के हृदय सरोवर को भर देती हैं । श्रीभट्टजी श्रीप्रियाप्रियतम की जय-जयकार करते हुए कहते हैं कि श्रीराधामाधव जब परस्पर गलबाही देकर खड़े होते हैं तब हाथों के कंकन तथा कानों के कुण्डल ये सभी मिलकर उनके दर्पण सदृश कपोलों में प्रतिबिंबित होकर हिलोरें लेते हुए सुशोभित होते हैं। श्रीप्रियाप्रियतम को इस नख-शिख शोभा का दर्शन कर सखीस्वरूप श्रीभट्टजी आनन्द मग्न हो जाते हैं।
नषसिष सुषमा के दोउ, रतनागर रसिकेस।
अद्भुत राधामाधवी, जोरी सहज सुदेस॥
(पद) [तिताल, राग - केदारौ]
राधामाधव अद्भुत जोरी।
सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1]
नष सिष सब सुषमा रतनागर भरत रसिकवर हृदय सरोरी।
जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल, गंड वलय मिलि लसत हिलोरी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (56)
(दोहा)
श्रीराधा-माधव के नख से शिख तक शोभा का सागर लहलहाता दिखाई देता है। रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी अपनी सहज स्वाभाविक सुषमा से रसिकजनों के मन को मोह लेती है।
श्रीभट्टजी अपने परमाराध्य श्रीयुगलकिशोर का गुणगान करते हुए कहते हैं—
(पद)
(श्रीवृन्दावन में नित्य प्रति विहार करने वाली) श्रीराधामाधव की यह जोड़ी परम अद्भुत है। जिनका नित्य बिहार सदा-सनातन, एकरस एवं अविचल है, ऐसे नवलकिशोर किशोरी श्रीराधा माधव की यह जोड़ी अङ्ग प्रत्यङ्गादि सर्वप्रकार से नख-शिख की शोभा के सार-समुद्र के रूप में वर्तमान होने के कारण परम अद्भुत है।[1]
जिस प्रकार समुद्र अपने समीपस्थ सरोवरादि को उमड़ कर तथा दूरस्थ नद-नदी आदि को मेघ द्वारा बरस कर भर देता है, उसी प्रकार श्री प्रिया प्रियतम अपनी निकटवर्ती सखीजनों के हृदय रूपी सरोवर को अपनी शोभा से आप्लावित कर देते हैं और सहचरियाँ श्रीप्रियाप्रियतम की रूप- माधुरी का पान कर अन्यान्य रसिकजनों के हृदय सरोवर को भर देती हैं । श्रीभट्टजी श्रीप्रियाप्रियतम की जय-जयकार करते हुए कहते हैं कि श्रीराधामाधव जब परस्पर गलबाही देकर खड़े होते हैं तब हाथों के कंकन तथा कानों के कुण्डल ये सभी मिलकर उनके दर्पण सदृश कपोलों में प्रतिबिंबित होकर हिलोरें लेते हुए सुशोभित होते हैं। श्रीप्रियाप्रियतम को इस नख-शिख शोभा का दर्शन कर सखीस्वरूप श्रीभट्टजी आनन्द मग्न हो जाते हैं।

