उपासनीयं नितरां जनै: सदा - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (6)

उपासनीयं नितरां जनै: सदा - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (6)

उपासनीयं नितरां जनै: सदा, प्रहाणयेअज्ञानतमोअनुवृत्ते:।
सनन्दनाद्योर्मुनिभिस्तथोक्तं, श्रीनारदायाखिलतत्वसाक्षिणे॥

- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (6)

इन श्रीराधाकृष्ण युगल किशोरात्मक परब्रह्म की निरंतर उपासना करते रहना चाहिए । उनके ध्यान मात्र से अज्ञान ( तम अविद्या की) अनुवृति क्षीण हो जाती है। हमारे (श्री निम्बार्काचार्य के) परमगुरु श्री सनकादिक ने अखिल तत्वज्ञ गुरुदेव श्री नारदजी को यह उपदेश दिया था।