(राग सारंग)
रसिकिनी राधा रस भीनी।
मोहन रसिक लाल गिरधर पिय, अपने कंठमनि कीन्हीं॥ [1]
रसमय अंग-अंग रसरसमय, रसिक रसिकता चीन्ही।
उभय स्वरूप कीरति न्योंछावर, 'कृष्णदास' कर दीन्ही॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (695)
श्री कृष्णदास कहते हैं "रसिकनी श्री राधा जू रस से ओत-प्रोत हैं, जिन्हें रसिक शेखर श्री लाल गिरधर ने अपने कंठ की मणि कर लिया है (अर्थात ह्रदय से लगा लिया है )।" [1]
श्री राधा का अंग अंग रस से सराबोर है जिसका थोड़ा सा स्पर्श पाकर ही रसिक शेखर श्याम सुंदर को रसिकता का परिचय प्राप्त हुआ । श्री कृष्ण दास कहते हैं "इस दिव्य लीला का आस्वादन कर मैंने अपना सर्वस्व कीरति कुमारी श्री राधा पर न्योछावर कर दिया है। " [2]
रसिकिनी राधा रस भीनी।
मोहन रसिक लाल गिरधर पिय, अपने कंठमनि कीन्हीं॥ [1]
रसमय अंग-अंग रसरसमय, रसिक रसिकता चीन्ही।
उभय स्वरूप कीरति न्योंछावर, 'कृष्णदास' कर दीन्ही॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (695)
श्री कृष्णदास कहते हैं "रसिकनी श्री राधा जू रस से ओत-प्रोत हैं, जिन्हें रसिक शेखर श्री लाल गिरधर ने अपने कंठ की मणि कर लिया है (अर्थात ह्रदय से लगा लिया है )।" [1]
श्री राधा का अंग अंग रस से सराबोर है जिसका थोड़ा सा स्पर्श पाकर ही रसिक शेखर श्याम सुंदर को रसिकता का परिचय प्राप्त हुआ । श्री कृष्ण दास कहते हैं "इस दिव्य लीला का आस्वादन कर मैंने अपना सर्वस्व कीरति कुमारी श्री राधा पर न्योछावर कर दिया है। " [2]

