जात के हैं हम तो व्रजबासी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (65)

जात के हैं हम तो व्रजबासी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (65)

(सवैया)
जात के हैं हम तो व्रजबासी, सु नाहिं रही और जात की बाधा। [1]
देश हैं घोष न चाहत मोष कौं, तीरथ श्री जमुना सुखसाधा॥ [2]
संतनि को सतसंग आजीवका, कुंज बिहार अहार अगाधा। [3]
‘नागर’ के कुलदेव गोवर्धन, मोहन मंत्र अरु इष्ट हैं राधा॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (65)

हमारी असली पहचान यही है कि हम ब्रजवासी हैं; अब अन्य जाति-पांति की कोई बाधा शेष नहीं रही। [1]

हमारा देश केवल ग्वालों का समूह (व्रज) है, हमें और किसी देश की चाह नहीं; तीर्थ के रूप में हमें श्रीयमुना ही सर्वोच्च सुख देने वाली है। [2]

संतों का सत्संग हमारा आजीवन धन है, और कुंजों में होने वाले युगल नित्य विहार हमारे लिए अतुलनीय भोजन समान है। [3]

श्री नागरीदास जी कहते हैं—हमारे कुलदेवता गोवर्धन हैं, हमारा मंत्र मोहन है, और हमारी इष्ट श्री राधा महारानी हैं। [4]