सखीभिः सम्भूय स्वकरकमलद्वन्द्वकलितैर्जलैः सेकं राधा बहु विदधती नागरमणेः।
सुधापूर्णान् वर्णान्नमित वदनेन्दोरलमलं जितोऽस्मीत्याकर्ण्याऽसदुपरता यत्र किमिति॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.4)
श्रीराधाजी सब सखियों के साथ मिल कर नागरमणि (श्रीश्यामसुन्दर) के शरीर पर अपने दोनों कर-कमलों से जब अनेक जल सिञ्चन करने लगीं, तब श्रीश्यामसुन्दर अपने मुख चन्द्र को झुका कर “और नहीं, और नहीं, मैं हार मानता हूँ" ऐसा कहने लगे । श्रीश्यामसुन्दर के ये अमृतमय वचन सुन कर श्रीराधाजी जल फैंकना बन्द कर क्या अद्भुत हंसी ?
सुधापूर्णान् वर्णान्नमित वदनेन्दोरलमलं जितोऽस्मीत्याकर्ण्याऽसदुपरता यत्र किमिति॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.4)
श्रीराधाजी सब सखियों के साथ मिल कर नागरमणि (श्रीश्यामसुन्दर) के शरीर पर अपने दोनों कर-कमलों से जब अनेक जल सिञ्चन करने लगीं, तब श्रीश्यामसुन्दर अपने मुख चन्द्र को झुका कर “और नहीं, और नहीं, मैं हार मानता हूँ" ऐसा कहने लगे । श्रीश्यामसुन्दर के ये अमृतमय वचन सुन कर श्रीराधाजी जल फैंकना बन्द कर क्या अद्भुत हंसी ?

