(राग विहागरौ)
प्यारी पिय प्रेम-भक्ति दीजै।
गदगद गिरा सुनत रोमांचित अश्रु पुलक भीजै॥ [1]
महा प्रसाद दरस चरनामृत साधु संग कीजै।
श्री वृंदावनधाम रसिकवर नाम सुधा पीजै॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)
हे युगल सरकार पिय प्यारी, मुझे अपनी प्रेम भक्ति प्रदान कीजिए । आपके नाम गुणगान से मेरी वाणी गदगद हो उठे, आपका यश सुन मेरा रोम रोम रोमांचित हो जाए, अश्रुओं की धारा बह जाए, एवं शरीर पुलकित हो उठे । [1]
मुझे महाप्रसाद दीजिए, अपना दर्शन प्रदान करिए, चरणामृत दीजिए एवं नित्य ही रसिकों का संग प्रदान कीजिए । श्री रूप सखी जी कहती हैं कि मुझपर ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे नित्य ही श्री वृंदावन धाम का वास प्राप्त हो एवं रसिक शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी का पान किया हुआ नाम सुधा रस मैं भी पान कर सकूँ । [2]

