खंजन मीन सरोजन को - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

खंजन मीन सरोजन को - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

(सवैया)
खंजन मीन सरोजन को मृग को मद गंजन दीरघ नैना। [1]
कुंजन ते निकस्यौ मुसकात सु पान पर्यो मुख अमृत बैना॥ [2]
जाई रहे मन प्रान विलोचन कानन में रचि मानत चैना। [3]
रसखानि कर्यौ घर मो हिय में निसिवासर एक पलौ निकसे ना॥ [4]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

श्री कृष्ण के नेत्र खंजन (पक्षी), मीन, कमल-पुष्प एवं हिरण के नेत्रों की सुंदरता को पराजित करते हैं। [1]

वे मुस्कराते हुए कुंज से बाहर आए और उनके अधरों से अमृतमयी वाणी बरसी, जिसने मुझे मोहित कर लिया। [2]

उनकी अनुपम छवि मेरे मन, प्राण और नेत्रों में गहराई तक बस गई है, जो चित्त को सतत आनंद से सराबोर कर रही है। [3]

श्री रसखान कहते हैं, उनकी सुंदर छवि ने मेरे ह्रदय में ऐसा घर बना लिया है जो एक पल के लिए भी निकलती नहीं। [4]