राग-द्वेष हमरे नहीं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (306)

राग-द्वेष हमरे नहीं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (306)

राग-द्वेष हमरे नहीं, नहीं देह अभिमान। 
नित्त प्रिया मिलि भाव सों, ललित सु रसिक सुजान॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (306)

किसी से राग या द्वेष करना हमारा धर्म नहीं है, और न ही देह का अभिमान करना यहाँ की रीति है। यहाँ तो बस भाव के साथ सदा प्रियाजी (श्री राधा) से मिले रहो। इस प्रकार निरन्तर प्रियाजी से मिले रहने वाला व्यक्ति ही केलि-रस का सुविज्ञ रसिक होता है।