लगै जौ वृन्दावन कौ रंग - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (223)

लगै जौ वृन्दावन कौ रंग - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (223)

(राग सारंग)
लगै जौ वृन्दावन कौ रंग।
सब संदेह देहके जैहैं, अरु विषयनि कौ संग॥ [1]
जैसैं बाजहि नाजु लगतही, करत है उदर मृदंग।
अैसैं सहजमाधुरी परसत, उपजत गुनकौ अंग॥ [2]
जैसैं कामी कामिनी देखत, वाढत दुसह अनंग।
अैसैंहिं व्यास विहार विलोकत, साधन सौं चित भंग॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (223)

श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिस जीवको वृन्दावन का रंग लग जाता है, उसके शरीर सम्बन्धी समस्त संदेह समाप्त हो जाते हैं तथा विषय से पूर्ण वैराग्य हो जाता है।" [1]

जिस प्रकार मृदंग पर आटा लगते ही वह बजने लगता है, इसी प्रकार वृन्दावन की सहज माधुरी का परस करते ही समस्त गुण ह्रदय में प्रकट हो जाते हैं। [2]

श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिस प्रकार एक कामी को कामिनी का दर्शन करने से कामदेव उसके पूर्ण चित्त का आकर्षण कर लेता है, उसी प्रकार श्री श्यामाश्याम के नित्य विहार के दर्शनोपरांत मेरे चित्त ने सभी साधनों का त्याग कर दिया है”। [3]