मेरे प्रानधन स्वामिनी स्याम राधे।
एक रस रूप सम बैस बारिजबदन,
छके रहैं प्रेम, यह नैन साधे॥ [1]
करत कल केलि बिपरीत बिबि परस्पर,
बिछुर नहिं जात कहुँ पलक आधे। [2]
नैन की सैन बर बैन भगवतरसिक,
देत सुख, लेत सहचरि अगाधे॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ (2.7)
रसिक सखी भगवतअलि जी कहती है कि श्री लालजी एवं उनकी स्वामिनि ही मेरे प्राण धन हैं । कमल के सदृश मुखवाले ये लाडली लाल एक ही रस, एक ही रूप और एक ही समान वयस् से अलंकृत हैं। ये सदा प्रेम में छके रहते हैं, यही इनकी नियम है और इसी की साधना में ये सदा लगे रहते हैं। [1]
ये दोनों परस्पर विपरीत रति की केलि करते रहते हैं और कभी आधे पल के लिये भी बिछुड़ कर कहीं नहीं जाते। [2]
रसिक सखी श्री भगवतअलि जी नयन संकेत रूपी उत्तम वचनों द्वारा इन्हें (नित्यविहार का उपयुक्त उपदेश देती हुई) निरंतर अनंत अनंत आनंदराशि का आदान प्रदान करती रहती हैं। [3]
एक रस रूप सम बैस बारिजबदन,
छके रहैं प्रेम, यह नैन साधे॥ [1]
करत कल केलि बिपरीत बिबि परस्पर,
बिछुर नहिं जात कहुँ पलक आधे। [2]
नैन की सैन बर बैन भगवतरसिक,
देत सुख, लेत सहचरि अगाधे॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ (2.7)
रसिक सखी भगवतअलि जी कहती है कि श्री लालजी एवं उनकी स्वामिनि ही मेरे प्राण धन हैं । कमल के सदृश मुखवाले ये लाडली लाल एक ही रस, एक ही रूप और एक ही समान वयस् से अलंकृत हैं। ये सदा प्रेम में छके रहते हैं, यही इनकी नियम है और इसी की साधना में ये सदा लगे रहते हैं। [1]
ये दोनों परस्पर विपरीत रति की केलि करते रहते हैं और कभी आधे पल के लिये भी बिछुड़ कर कहीं नहीं जाते। [2]
रसिक सखी श्री भगवतअलि जी नयन संकेत रूपी उत्तम वचनों द्वारा इन्हें (नित्यविहार का उपयुक्त उपदेश देती हुई) निरंतर अनंत अनंत आनंदराशि का आदान प्रदान करती रहती हैं। [3]

