श्री नवनागरी प्यारी तू वृन्दावन की रानी - श्री विष्णुदास जी

श्री नवनागरी प्यारी तू वृन्दावन की रानी - श्री विष्णुदास जी

(राग विलावल)
श्री नवनागरी प्यारी तू वृन्दावन की रानी।
बिहारिन लाड़ली प्यारी तेरी कीरति जगत बखानी॥ [1]
जगत मैं जगमग रहयो यश बिन कृपा क्यों बूझही।
अभिमान अन्धा लोग करमठ ताहि कछुवन सूझही॥ [2]
करौ कृपा परम उदार ये मोही बार-बार सुहावही।
बलिजाऊँ श्री वृषभानु नन्दनी सुजस तिहारौ गावही॥ [3]

- श्री विष्णुदास जी

हे नवनागरी श्री प्यारी जू, आप श्री वृंदावन की महारानी हैं। हे बिहारिनि लाडिली जू, हे प्यारी जू, ब्रह्मांड में समस्त रसिकों ने आपकी कीर्ति का बखान किया है। [1]

आपकी कीर्ति पूरे विश्व में जगमगा रही है, लेकिन केवल वही जान सकते हैं जिन पर आप कृपा करती हैं। अभिमान से अंधे हुए लोग, जो सांसारिक कार्यों में बंधे हुए हैं, आपके बारे में कुछ नहीं समझ सकते हैं। [2]

हे परम उदार चूड़ामणि वृषभानु नंदिनी श्री किशोरी जू, मेरा ह्रदय आपसे बार-बार विनती करता है, कृपया मुझ पर ऐसी कृपा करें की मैं सदैव आपका सुजस गाऊँ और इसके अतिरिक्त मुझे अपने देह का भी भान न रहे। [3]