कामेश्वर महादेव
आखिर कामेश्वर नाम क्यों पड़ा? उनके अनेक नाम हैं - नीलकंठ, चंद्रमौलि, गंगाधर, शम्भो, शंकर किन्तु कामेश्वर होने का एक विशेष कारण है - चूंकि यहाँ पार्वती जी ने भगवान् शंकर से दुर्लभ कामनाएँ प्राप्त की थीं, वे आज तक अपूर्ण थीं, कामवन में ही पूरी होने से नाम कामेश्वर पड़ा। वह दुर्लभ कामना थी- कृष्णप्राप्ति। लक्ष्मी जी ने कहा है
स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं समन्ततः पाति भयातुरं जनम्।
स एक एवेतरथा मिथो भयं नैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥
(भागवतम् 5/18/20)
"जो कर्म, काल के आधीन है वह पति नहीं है क्योंकि वह दूसरे की रक्षा नहीं कर सकता है। सर्प के मुँह में पड़ा मेंढ़क भला दूसरे की क्या रक्षा कर सकता है?"
पार्वती जी ने भगवान् शंकर जी से राधा तत्व के विषय में जिज्ञासा की, यह कथा भगवान् नारायण ने नारद जी को सुनाई थी। भगवान् शंकर सनत्कुमार को रास का प्रसंग सुना रहे थे। सनत्कुमार व पार्वती जी दोनों प्रेम से सुन रहे थे। सभीत पार्वती जी ने जिज्ञासा की कि कुछ राधा तत्व बताएँ, पहले जब पूछा तो शंकर जी ने नहीं बताया, अतः अब डरते हुए पूछ रही हैं। "श्रुतियों में कण्वशाखा में युगल सरकार की प्रशंसा है, जिसे व्यास जी ने गाया है, वह आप हमें बताएँ।" कामेश्वर ने यह प्रश्न सुनकर मस्तक नत कर लिया और ध्यानस्थ हो प्रभु से प्रार्थना की - "प्रभो! बड़ी गूढ़ जिज्ञासा कर बैठी हैं पार्वती। एक बार आपने यह कहने से हमें मना कर दिया, अब कहें या न? " सप्रेम प्रभु ने आज्ञा कर दी - "शम्भो ! जब ये सती थीं, मैं जानता था ये देह त्याग करेंगी। अब पार्वती बनीं हैं, अब कोई भय नहीं है अतः सुना दो।" शंकर जी ने पार्वती जी से कहा - "वह तत्व मैं, शेष, ब्रह्मा, सनत्कुमार ही जानते हैं अन्य कोई नहीं। हे दुर्गे! सावधानतया सुनो - राधा रानी को राधा क्यों कहते हैं 'रा' 'धा' रा माने रास, धा माने दौड़ना, श्रीकृष्ण की ओर दौड़ीं अतः धावन गति के कारण नाम राधा पड़ा। "रासे सम्भूये गोलोक" कृष्ण प्राणाधिष्ठात्री देवी होने से भी इन्हें राधा कहा जाता है। राधारानी के बिना संसिद्धि कहीं सम्भव नहीं है। 'रा' शब्द के उच्चारण से निश्चित मुक्ति मिलती है। 'धा' शब्द के उच्चारण से निश्चित कृष्ण प्राप्ति हो जाती है। 'रा' का अर्थ पाना, 'धा' का निर्वाण। राधा-कृष्ण में परस्पर आराध्य-आराधक भाव सम्बन्ध है। महालक्ष्मी जिनका आश्रय लेती हैं।
"जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इंदिरा शश्वदत्र हि"
(भागवतम् १०/३१/१)
लक्ष्मी को यह रस अप्राप्त रहा। महाविष्णु की जननी है ये श्रीराधा।
धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ्घ्र्यब्जरेणवः।
यान्ब्रह्मेशौ रमा देवी दधुर्मूर्ध्न्यघनुत्तये॥
(भागवतम् १०/३०/२९)
श्रीजी की चरण रज को लक्ष्मी अपने पाप नाश हेतु मस्तक पर धारण करती हैं। वे राधावल्लभ ही परतत्व हैं, तुम उनकी उपासना करो, अतः वे कामेश्वर बोले गये।
यहाँ कामना पूरी होने के कारण कामां में प्रभु कामेश्वर हुए क्योंकि सबकी इच्छा पूरी करने वाली आदि शक्ति की कामना उन्होंने पूर्ण की थीं ।
ततो कामेश्वरमहादेव प्रार्थनामन्त्र (लिंग पुराण):
कामेश्वराय देवाय कामनार्थ प्रदायिने।
महादेवाय ते तुभ्यं नमस्ते मुक्तिदो भव॥
हे कामेश्वर ! कामनाओं और अर्थ को देने वाले महादेव आपको नमस्कार है। हे मुक्ति दान देने वाले महादेव ! आपको नमस्कार है।
स्थान :
श्री कामेश्वर महादेव मंदिर, काम्यवन ग्राम के उत्तर-पूर्व कोने में स्थित हैं। भगवान कामेश्वर यहाँ क्षेत्रपाल के रूप में विराजमान हैं।
आखिर कामेश्वर नाम क्यों पड़ा? उनके अनेक नाम हैं - नीलकंठ, चंद्रमौलि, गंगाधर, शम्भो, शंकर किन्तु कामेश्वर होने का एक विशेष कारण है - चूंकि यहाँ पार्वती जी ने भगवान् शंकर से दुर्लभ कामनाएँ प्राप्त की थीं, वे आज तक अपूर्ण थीं, कामवन में ही पूरी होने से नाम कामेश्वर पड़ा। वह दुर्लभ कामना थी- कृष्णप्राप्ति। लक्ष्मी जी ने कहा है
स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं समन्ततः पाति भयातुरं जनम्।
स एक एवेतरथा मिथो भयं नैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥
(भागवतम् 5/18/20)
"जो कर्म, काल के आधीन है वह पति नहीं है क्योंकि वह दूसरे की रक्षा नहीं कर सकता है। सर्प के मुँह में पड़ा मेंढ़क भला दूसरे की क्या रक्षा कर सकता है?"
पार्वती जी ने भगवान् शंकर जी से राधा तत्व के विषय में जिज्ञासा की, यह कथा भगवान् नारायण ने नारद जी को सुनाई थी। भगवान् शंकर सनत्कुमार को रास का प्रसंग सुना रहे थे। सनत्कुमार व पार्वती जी दोनों प्रेम से सुन रहे थे। सभीत पार्वती जी ने जिज्ञासा की कि कुछ राधा तत्व बताएँ, पहले जब पूछा तो शंकर जी ने नहीं बताया, अतः अब डरते हुए पूछ रही हैं। "श्रुतियों में कण्वशाखा में युगल सरकार की प्रशंसा है, जिसे व्यास जी ने गाया है, वह आप हमें बताएँ।" कामेश्वर ने यह प्रश्न सुनकर मस्तक नत कर लिया और ध्यानस्थ हो प्रभु से प्रार्थना की - "प्रभो! बड़ी गूढ़ जिज्ञासा कर बैठी हैं पार्वती। एक बार आपने यह कहने से हमें मना कर दिया, अब कहें या न? " सप्रेम प्रभु ने आज्ञा कर दी - "शम्भो ! जब ये सती थीं, मैं जानता था ये देह त्याग करेंगी। अब पार्वती बनीं हैं, अब कोई भय नहीं है अतः सुना दो।" शंकर जी ने पार्वती जी से कहा - "वह तत्व मैं, शेष, ब्रह्मा, सनत्कुमार ही जानते हैं अन्य कोई नहीं। हे दुर्गे! सावधानतया सुनो - राधा रानी को राधा क्यों कहते हैं 'रा' 'धा' रा माने रास, धा माने दौड़ना, श्रीकृष्ण की ओर दौड़ीं अतः धावन गति के कारण नाम राधा पड़ा। "रासे सम्भूये गोलोक" कृष्ण प्राणाधिष्ठात्री देवी होने से भी इन्हें राधा कहा जाता है। राधारानी के बिना संसिद्धि कहीं सम्भव नहीं है। 'रा' शब्द के उच्चारण से निश्चित मुक्ति मिलती है। 'धा' शब्द के उच्चारण से निश्चित कृष्ण प्राप्ति हो जाती है। 'रा' का अर्थ पाना, 'धा' का निर्वाण। राधा-कृष्ण में परस्पर आराध्य-आराधक भाव सम्बन्ध है। महालक्ष्मी जिनका आश्रय लेती हैं।
"जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इंदिरा शश्वदत्र हि"
(भागवतम् १०/३१/१)
लक्ष्मी को यह रस अप्राप्त रहा। महाविष्णु की जननी है ये श्रीराधा।
धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ्घ्र्यब्जरेणवः।
यान्ब्रह्मेशौ रमा देवी दधुर्मूर्ध्न्यघनुत्तये॥
(भागवतम् १०/३०/२९)
श्रीजी की चरण रज को लक्ष्मी अपने पाप नाश हेतु मस्तक पर धारण करती हैं। वे राधावल्लभ ही परतत्व हैं, तुम उनकी उपासना करो, अतः वे कामेश्वर बोले गये।
यहाँ कामना पूरी होने के कारण कामां में प्रभु कामेश्वर हुए क्योंकि सबकी इच्छा पूरी करने वाली आदि शक्ति की कामना उन्होंने पूर्ण की थीं ।
ततो कामेश्वरमहादेव प्रार्थनामन्त्र (लिंग पुराण):
कामेश्वराय देवाय कामनार्थ प्रदायिने।
महादेवाय ते तुभ्यं नमस्ते मुक्तिदो भव॥
हे कामेश्वर ! कामनाओं और अर्थ को देने वाले महादेव आपको नमस्कार है। हे मुक्ति दान देने वाले महादेव ! आपको नमस्कार है।
स्थान :
श्री कामेश्वर महादेव मंदिर, काम्यवन ग्राम के उत्तर-पूर्व कोने में स्थित हैं। भगवान कामेश्वर यहाँ क्षेत्रपाल के रूप में विराजमान हैं।

