हमें ब्रज-लाड़िले सों काज - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (573)

हमें ब्रज-लाड़िले सों काज - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (573)

(राग गौरी)
हमें ब्रज-लाड़िले सों काज।
जस अपजस कौ हमें डर नाँही, कहनी होय सो कहिये आज॥ [1]
काहू कछु प्रीति करी कै नकरी जो, सन्मुख ब्रज नृप युवराज।
'गोविन्द' प्रभु की कृपा चाहिये, वे हैं सकल घोष-सिरताज॥ [2]

- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (573)

मुझे तो एकमात्र ब्रज के लाड़िले श्री कृष्ण से ही काम है। मुझे यश और अपयश का कोई भय नहीं है, यदि मुझे कोई बुरा कहे या भला, आज कुछ भी कहे, मुझे अब किसी की कोई परवाह नहीं है । [1]

श्री गोविंद स्वामी कहते हैं कि मुझसे कोई प्रेम करे अथवा न करे, मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है, मेरे आँखों के समक्ष तो सदैव ब्रज राज नन्द-नंदन श्री श्यामसुंदर विराजमान रहते हैं, जो समस्त ग्वालों के सिरताज हैं, मुझे तो एकमात्र उन्हीं प्रभु की कृपा चाहिए। [2]