(कवित्त)
चाहत हैं जाकी रज संभु चतुरानन से,
चाहत हैं जाकी रज संभु चतुरानन से,
करें गुनगान उत्साह बास ही कौ है। [1]
धर धर ध्यान हारे सामल सुजान ही कौ,
स्वामिनी कृपा बिना न मिलत घरी कौ है॥ [2]
करत खवासी हरिदासी हरिवंसी व्यासी,
जिही जो दिवावें होय दासी भाव जी कौ है। [3]
'लाल बलबीर' नीकौ लागे प्रान पीकौ प्यारौ,
वृन्दावन - चन्द वृषभानु नन्दनी कौ है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृंदावन अष्टक (2)
जिस वृंदावन धाम की रज को साक्षात शिव जी, चतुरानन इत्यादि भी चाहते हैं एवं बड़े ही उत्साह से वृंदावन का गुणगान कर वृंदावन वास की कामना रखते हैं। [1]
ऐसे ज्ञानी एवं परमहंस, भक्त इत्यादि जो श्री कृष्ण का ध्यान लगा लगा कर हार गए, परंतु बिना स्वामिनी श्री राधा की कृपा के एक क्षण का भी वृन्दावन वास प्राप्त नहीं कर सके। [2]
वृन्दावन एवं श्री स्वामिनी जी की सेवा तो उनके निज जन रसिक त्रिवेणी अर्थात् श्री हरिदासी (स्वामी हरिदास), श्री हरिवंशी (श्री हित हरिवंश महाप्रभु), एवं श्री व्यासी (श्री हरिराम व्यास) के पास है। जिनको इन रसिकों की कृपा प्राप्त हो जाए केवल वह ही श्री राधा दासी भाव को प्राप्त कर वृन्दावन का रस प्राप्त करता है, अन्य किसी में सामर्थ नहीं। [3]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि यह वृंदावन धाम अत्यंत सुंदर एवं मनोहर है, यह श्री श्याम सुंदर का मानो प्राणों से भी अधिक प्रिय है क्यूँकि यह वृंदावन धाम साक्षात निकुंजेश्वरी वृषभानु नन्दनी श्री राधा का है। [4]

